लोकतंत्र और जनता


लोकतंत्र में किसी भी वर्ग का कोई भी कार्य करने वाला नागरिक अपनी आर्थिक बौद्धिक और शारीरिक विपन्नता के बाबजूद भी, जो न्यायलय द्वारा किसी जुल्म में दण्डित न किया गया हो और मानसिक रूप से विकृत न हो वह किसी भी राजनैतिक पद को गौरवान्वित कर सकता है यदि जनता  उसे उपयुक्त समझती है|  ऐसे व्यक्ति के साथ दलीय समर्थन भी तब गौण हो जाता है जब जनमत का सैलाब उसके पक्ष में खड़ा हो| किसी के गुण अवगुण और उसकी पद के हेतु पात्रता का मानक लोकतंत्र में केवल बहुमत का आधार होता है|प्रत्याशी की आलोचना और समालोचना उसके व्यक्तित्व और कृतित्व का खंडन और मंडन कुछ विद्वानों के बौद्धिक चिंतन का विषय हो सकता है लेकिन जनमत के आगे बहुत प्रभावी नहीं हो पाता|इन सब परिस्थितियों के मध्य इतना अवश्य विचारणीय रहता है कि उसके द्वारा जो घोषणायें की जा रही हैं जिनके बल पर उसने जनमत को अपनी ओर अपने पक्ष में आकर्षित किया है वे कितनी सच्चाई और ईमानदारी के साथ व्यावहारिक हैं| अन्यथा दिल्ली की बिल्ली सत्ता के दूध को फैला सकती है न खुद पी सकती है न जनता को पिला सकती है|

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